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Father’s Diary – Part 1

एक पिता की कलम से प्रिय पुत्र, शुभाशीष, जहाँ भी रहो खुश रहो मेरी बाँहों में जब तुम चौधवी का चाँद बन कर आए तो जीवन का सारा अधूरापन एक पल में ही मिट गया | कभी मै उस वक़्त प्रकृति की हरियाली प्रतिबिंबित करती तुम्हारी हरी आँखों में खो जाता तो कभी तुम्हारी कोमल घुँघराली अलकावली में उलझ जाता …