Father’s Diary – Part 3

समाज

जब किसी चट्टान पर अनेक प्रहार किये जाते है, लेकिन वह विक्षिप्त सौवे प्रहारपर होती है, इसका अर्थ ये नहीं कि सौवे प्रहार ने उसे तोडा है अपितु यह है कि निन्यानवे प्रहारों ने उसे कमजोर किये है | समाज हबी व्यक्ति के ह्रास में इन अपरिलक्षित प्रहारों कि भूमिका निभाता है | लोगो का एहसान फरामोश रुख भी मेरे बच्चे, शायद तुम्हे मुझसे चीनने का कारण बना | मैंने लोगो को वोह दिया जिसपर सिर्फ तुम्हारा हक था और जैसे ही उन्हें वो मिल गया जो पाने वो मेरे पास आए थे, गिरगिट की तरह, वो बदल गये |

मेरे परोपकारी स्वाभाव के कारण मेरे परिवार को सबसे ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ा | कुछ दिन पहले जब तुम्हारी दादी को ख़राब स्वस्थ्य की वजह से अस्पताल में भरती कराया गया, मेरा संपूर्ण ध्यान उनपर केन्द्रित होना था लेकिन तब भी लोग छह रहे थे की मै उनकी ज़रूरतों पर ध्यान दूँ और ऐसे ही रहूँ जैसे सब ठीक है |

कभी धनराशी खोकर में तो कभी रिश्तो में कभी पूरी न होने वाली दूरियों के रूप में मुझे भारी कीमत चुकानी पड़ी | मेरा एन-केन प्रकारेण दूसरो की सहायता करना उन्होंने अपना अधिकार समझा जो मेरे लिए एक बार नहीं अनेक बार घटक सिद्ध हुआ लेकिन कहते है ना कि संत कितना भी धोखा खाए, वो अपनी अच्छाई नहीं छोड़ सकता और दुष्ट अपनी बुराई की प्रवृत्ति नहीं छोड़ सकता और भारतवर्ष में अच्छाई की कद्र नहीं होती जिस बात से तुम विदेश के पक्षपाती रहे हो |

कुछ समय पूर्व तुम्हारा अज़ीज़ मित्र भी नहीं रहा | तुम्हारा वो सहोदर सदृश था | कदाचित तुम उससे उन प्रसंगों की चर्चा करते थे जिन्हें तुम मुझसे नहीं कह पाते थे | शायद मेरा ध्यान उसके परिवार का दुःख बांटने में इतना था की तुम्हारी इस पीड़ा का ख्याल होए हुए भी अनजान बनाना पड़ा | तुम उसके निधन का अघात सह नहीं पाए | मैंने उस मोहल्ले को भी छोड़ने का प्रयत्न किया किन्तु यह अंततः संभव न हो सका |

तभी से मै समझ गया कि अब कुछ ऐसा घटित होने वाला है जो मुझे हमेशा के लिए बदल देगा | तुम्हारे मित्र का इस दुनिया से जाना भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की भूमिका थी | मुझे बस यही समझ आता है कि जैसे जैसे हम ईश्वरीय योजना की सम्पूर्णता के करीब पोहोचते है, कठिनाईया और बढ़ जाती है लेकिन मेरे पुत्र, अब तो मै अपूर्ण हो गया |

कभी-कभी बड़े बुजुर्गो की दकियानूसी सोच व्यक्ति के जीवनयापन में बाधक बन जाती है | जब किशोर युवावस्था में प्रवेश करता/करती है, तब उसे हर क्षण संदिग्ध दृष्टि से देखा जाता है | किसी भी चीज़ की अति हानिकारक होती है, ये नियम सोच पर भी लागु होता है | मन की घर के बड़े अनुभव के धनि होते है इसका अर्थ ये नहीं वो उसपर अपनी सोच थोपे |

बुजुर्गो की इस निगरानी ने अक्सर आज के युवक का जीना दूभर कर देता है | वृक्ष के विकास के लिए पर्याप्त वर्षा और समुचित धूप देना आवश्यक है, किन्तु तुमने अपने उद्देश्यपूर्ति में वही मार्ग अपनाया जिसके लिए घर के बड़े और समाज विवश कर देते है | शायद अब उनके कलेजे को ठंडक मिले पर नहीं, उन्हें तो मौका चाहिए शिकायत करने का |

कभी-कभी जब मै तुमसे मजाकिया अंदाज़ में पूछता था कि तुम्हे कैसी दुल्हन पसंद है तो तुम कहते थे क्यों सांस बहु और बेटी के साथ दूजा भाव रखती है और बर्ताव करती है? बहु भी तो किसी की बेटी है | जब कोई नववधू नवीन परिवार में प्रवेश करती है , तब वो अपने सभी पुराने रिश्तो को पीछे छोड़कर आती है, इसका मतलब ये नहीं वो उन्हें तोड़कर आई है अपितु वो रिश्ते तो और अज़ीज़ बन जाते है उसी तरह जैसे पुराने मित्र कितने प्रिय होते है (मटके में रखा जल समय के साथ और शीतलता देता है ) |

सच है रिश्ते तो भाग्य देता है, दोस्त हम खुद चुनते है | लेकिन समाज के ये ख़राब ख्यालात जिनके कारण वो प्रत्येक लड़के तथा लड़की में दोषदृष्टि रखते है वास्तव में जीवन बर्बाद कर देते है | जिस प्रकार इस पुरुष प्रधान समाज ने तुम्हारी दोस्त को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, इस कारण तुम बहुत आहत हुए | तुम्हे याद है तुम सिकंदर के प्रशंसक इसलिए रहे हो क्योंकि वो स्त्रियों का सम्मान करता था |

यदि कुछ कारणों से मित्र दूर हो जाएँ , तो रिश्तो को अहंभाव दोस्ती के त्याग पर हावी हो जाता है और भयंकर दुश्परिनामो को अंजाम देता है | शादी के बाद भाई बहन भी आपस में बात नहीं कर सकते – वो तुम्हारी सहोदर थी, तुम्हारी परामर्शकर्ता, पर इस क्रूर समाज ने तुम्हारे इस पवित्र बंधन में भी दोष देखा और तुम्हे उससे भी दूर कर दिया |

एक परिवार में ३ पीढियां एक साथ रहे तो मदभेद होने अवश्यम्भावी है किन्तु कहते है ना, की मध्य में जो रहता है वो सर्वाधिक यंत्रणा सहता है इसलिए तीसरी पीढ़ी के कृत्या जो प्रथम पीढ़ी के लिए अवांछनीय है इसके लिए दूसरी पीढ़ियों को दोष दिया जाता है जो तुम्हारे लिए असहनीय था क्योंकि तुम्हारे कारण हमें गलत ठहराया जाना तुम्हारे लिए मृत्युतुल्य था |

इन सब के बावजूद तुम आसमान की उन्चैयो पर पोहोच तो रहे थे किन्तु तुम हर वक़्त शिखर पर रहना चाहते थे – मेरे बच्चे, जिंदगी की दौड़ में कायम रहना आवश्यक है, हमेशा जीतना संभव नहीं और हम जितना आगे सत्य के मार्ग पर चलते है कठिनाईयों का पैमाना बढ़ता है | हम अपनी जीत से उतना नहीं सीखते जितना अपनी हार से |

मझधार से निकलने की तुमने भरपूर कोशिश की है ताकि जोप सारे तुम्हारे अज़ीज़ थे उनमे से कोई तो तुमसे कह देता कि तुम उस दिन परीक्षा मत दो, लेकिन समुन्दर में रहते हुए भी तुम प्यासे रह गए | ये हम सबकी भूल है हम किनारा देख उस तक पहुचने की शीघ्रता में पहले ही इतने भरसक प्रयत्न कर चुके होते है कि वहां पहुँचते-पहुँचते हम हताश हो जाते है |

कुछ तो लोग कहेंगे क्यूंकि लोगो का काम है कहना लेकिन उनका कहना चाँद की ओर पत्थर फेकने सदृश है | अंततः वो वापस उन्हें ही ठेस पहुंचता है | मै सारी दुनिया यहाँ तक की ईश्वर के सारे प्रश्नों के उत्तर दे देता हूँ पर तुम्हारी माँ के समक्ष मै निरुत्तर हो जाता हूँ |

कैसे समझाऊ कि तुम्हारा ये कदम तो ईश्वर की योजना की पूर्ती में एक महत्वपूर्ण योगदान है जिसकी पृष्ठभूमि पर यही अंकित था क्योंकि तुम तो वो मांझी बनकर आए थे जिसने कम समय में बहुतो को पार उतारना था इसलिए तुम्हे ये मार्ग चुनना पड़ा |

तुम उसकी परछाई हो, इस्लिये कोई भी आर्ग्युमेंट उसे शान्ति नहीं देता पर फिर भी मै उसे समझाता हूँ कि जो अल्प आयु वाली आत्माए होती है वो कुछ वर्षो के लिए, किसी उद्देश्य की पूर्ती के लिए, किसी विशेष कारण से , संकल्प लेकर आती है और जाने का भी मार्ग स्वयं ही चुनती है | वो इतना कष्टप्रद इसलिए होता है क्योंकि इन्हें बहुतो के प्रारब्ध निष्प्रभाव करना होता है अतः ईश्वर की भी इनके तरीके में रजामंदी होती है और ये कामयाब हो जाते है | कुछ पूर्व पुण्य होते है और क़र्ज़ उतार के चले जाते है |

तुम्हारा ये लक्ष्य तो मेरे जन्म से निश्चित था-मेरे प्रारब्ध के अनुसार मेरे पुत्र का यही अंजाम था | वो कभी-कभी मुझे उल्हाना देते हुए कहती है की आप अब पत्थर दिल हो गए है | वास्तव में वो सच कहती है क्योंकि मेरे पत्थर दिल पर तुम अब अपनी अमिट रूप से अंकित हो |

इंद्र ने मारुती पर वज्र प्रहार किये तो उनकी माता की अधीरता पर उन्हें फ़िर जीवनदान मिला, लक्ष्मण को शक्ति लगने के बाद सर्वाधिक उनकी माता के सामने निरुत्तर होने की दुहाई देने लगे, उन्हें भी पुनर्जीवित किया गया | तो फिर तुम्हारी माता का क्या दोष था | इसपर मै उसे उस कथा से परिचित करता हूँ जिसने कभी मुझे अज्ञात से बहार लायी और मुझे विश्वास है की ये उसे भी स्वयं से परिचित कराएगी कि दिया के टूटने के बाद बाति तो शेष रहती है लौ को प्रज्ज्वलित रखने के लिए :-

एक गरीब दंपत्ति विरक्ति के मार्ग चलना चाहती थी लेकिन वो संतान के सुख से वंचित नहीं रहना चाहती थी ताकि वो सांस्कारिक दायित्व को निभा सके किन्तु उन्हें संतान सुख प्राप्ति होते ही उसे त्यागना पड़ा जिसका अकथनीय विषाद हुआ किन्तु फिर उन्हें ज्ञात हुआ की उस क्षेत्र के निःसंतान रजा-रानी को वो संतान मिली है | कदाचित मेरे बच्चे, सब होते हुए भी मेरे पास तुम्हे वो नहीं मिलता जो अब मिल रहा है |

तुम्हारे इस जन्म की उद्देश्यपूर्ति के कुछ समय बाद मै तुम्हारी माँ के साथ हरिद्वार गया था तब गंगाजी की सीढ़ियों पर बैठ इसी विचार में खोया था कि जनसामान्य की धारणा के विपरीत बड़ी कुशलता से तुमने पितृमोक्ष अमावस्या के दिन उन्हें तार .

अनंतचौदस के दिन तुम आए, श्राद्धपक्ष के पूर्व जैसे वर्षा प्रदान करने वाला सूर्य ग्रीष्म में अपने ताप से बादलों को उत्पन्न करता है और स्वयं वर्षा के समय अपना अस्तित्व लुप्त कर देता है ऐसे ही श्राद्धपक्ष में शिवचौदस (पितृमोक्ष अमावस) के दिन अपना कार्य संपन्न करके अपना अस्तित्व ही समाप्त कर चल दिए | किन्तु सूर्य कितना भी बादलों में छुप जाये, वो ज्यादा देर तक छुप नहीं सकता | गणेश बनके आए और शिवरात्रि पर कुछ समय के लिए गए तो किन्तु फिर नए रूप में अवतरित होने के लिए | तुम तो दुखहर्ता हो, फिर तुम्हारी माँ ने तुम्हे अपने दुःख का कारण क्यों बना लिया ?

तुम्हारे जाने के बाद सबकुछ इतना शीघ्र हुआ-एक पूजन के समय तुम्हारी फोटो रखी थी, पूजन के बाद वो फोटो कहाँ गयी ये किसी को ज्ञात नहीं – वो मेरे दिल के पास है, मेरी जेब में | हमें तुम्हारे जीवनालेख का भान न हो इसलिए तुम पिछले कुछ दिनों से ईश्वर की कथा-पूजन के प्रति उदासीन रहने लगे थे ताकि हमें लगे कि ये तुम्हारी आयु का प्रभाव है | तुम्हारी माँ की ममता के अन्य बलिदानों को

नज़रंदाज़ करने पर भी उसकी प्राणघातक व्याधि से संघर्ष को मै कैसे जारी रखूं ? शायद तुम्हारे अतीत में झांककर इस प्रश्न का उत्तर मिल पाए |

 

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