Father’s Diary – Part 4

अलविदा के पूर्व :

हमें मानव जीवन परिपूर्णता प्राप्त करने के लिए मिलता है,तुममें वाकई ये पूर्णता विद्यमान थी,तुम हर कार्य सर्वोत्तम तरीके से करते थे भले ही समय और संसाधन का आधिक्य हो जाए लेकिन बाद में जो परिणाम उभरकर आता वो अद्वितीय होता जो तुम्हारे प्रयास के खिलाफ हमारे हर तर्क को विफल कर देता |

शेक्सपियर पर वाद विवाद प्रतियोगिता के शीर्षक पर तुमने इतनी खोज कर लिए जो मेरी दृष्टि में अत्यधिक थी किन्तु अन्ततः तुम उस प्रतियोगिता में अव्वल आए | जब भी अपने बीच कोई विवाद होता, मै हमेशा तुम्हे जीतने देता था ताकि तुम्हारा मनोबल बढ़ता जाये|

क्योंकि मै जानता हूँ की हम एक बार शिखर पर पहुच तो जाये पर वहां कायम रहने का दायित्व भी बहुत कठिन होता है इसलिए मै तुम्हारी शिखर तक की यात्रा को हर तरीके से मजबूत बनाना चाहता था | लेकिन मेरा डर सत्य सिद्ध हुआ |

दुनिया की सैर करने के तुम्हारे शौक की याद मुझे दुनिया में रहते हुए इससे जुदा कर देती है |तुम्हें याद है ,तुमने विश्व के नक़्शे पर वो सभी स्थान चिन्हित कर रखे थे जिनकी तुम्हे यात्रा करना है | मेक्सिको जाने के लिए तुम्हें वीसा देर से मिला तो तुमने उस स्थान को ही अपनी यात्रा चिन्हित स्थलों से काट दिया |

तुम्हें याद है ,लन्दन तुम्हारे जितने भी साथी थे , उन सबमें तुमने सबसे कम खर्चा किया क्योंकि अन्य साथियों की तरह तुम्हारे शौक नहीं थे- तुम्हारा बस सिनेमा देखने का खर्चा था | तुम्हें भी मेरी तरह अकेलापन ही रास आया | दुनिया को मैं समझाता रहा लेकिन तुम्हे समझाने की जरुरत ही नहीं पड़ीं की इस एकाकी, इस शून्य में ही तो ईश्वर समाहित है |

मॉस्को से तुम्हारा मुझे फ़ोन करना और बताना की वहां कौफी शॉप में ब्राजीलियन मित्र से ३ बजे रात तक तुमने कितनी सारी बातें बाटी (क्योंकि ४ बजे उसकी वापसी फ्लाइट थी), किन मित्रों को कौनसा उपहार भेजना,उन्होंने उन भेटों को अस्वीकार करना, तुम्हारी स्मृतियों को यूँ जगा देता है जैसे सावन में बारिश की झड़ी हो |

तुम्हारा एक दोस्त १२वी कक्षा के बाद वकालत में अध्ययन करने के लिए तुम्हें छोड़कर जा रहा था,तुमने उसे अपना आई पैड उपहार में दिए जिसके लिए तुम्हारी माँ ने तुम्हें हल्कि सी फटकार भी लगायी लेकिन अत्यंत भावुक होने की वजह से इस बात से तुम्हें बहुत ठेस पहुंची और तुम चिंता से अत्यंत व्याकुल हो गए ,फिर तुम्हें अस्पताल में भरती कराया गया और वहां तुम्हारी चिकित्सा करने के बाद तुम्हे घर लाया गया |

एक माह पूर्व मौस्को में व्यापारियों के संगठन को जिस परिपक्वता से तुमने संबोधित किया और फिर जिस सुलझे तरीके उनके साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किये वो तुम्हारी उम्र से कही आगे था | मुझे तुमपर गर्व है मेरे अंश और मै तुम्हे तुम्हारे सपनो का ऑफिस गिफ्ट करने वाला था लेकिन तुमने सिद्ध कर दिया कि भौतिक पदार्थ तुम्हारे लिए तुच्छ है | तुम्हारी मंजिल तो लोगो को मंजिल देना है जो सांसारिक सोच के बाहर है |

मैंने कितनो को शीर्ष पर पहुँचाया किन्तु तुम्हे यही अफ़सोस रहा कि तुमने क्या किया? पर मेरे बच्चे, जीवन हमेशा अधूरा ही रहता है | इसके अधूरेपन में ही इसका आकर्षण समाया हुआ है | दुनिया में कौन है जिसे क्रोध नहीं आता? किन्तु विकार के साथ हमें बहना नहीं चाहिए | विचार की सहायता से हमें विकार पर विजय पाने की कोशिश करना चाहिए |

(महात्मा बुद्ध ) सिद्धार्थ की तरह तुम्हारे पास सबकुछ था पर तुम्हारी मंजिल तो कही और थी क्योंकि सब ठीक था और तुम अपनी स्नातक उपाधि के लिए प्रतिष्ठित संस्था से अध्ययन कर रहे थे जिसने ये वचन दिया था कि उसके द्वारा दी गयी उपाधि भारत में भी मान्य होगी |

इस विश्वास के साथ तुम उस संस्था से पढाई कर रहे थे जो लन्दन में आधारित है| किन्तु तुम उस क्षण टूट गए जब दो वर्ष के गहन परिश्रम के बाद उस संस्था ने अचानक ये कहा कि उपाधि भारत में मान्य नहीं होगी और उस संस्था से उत्तीर्ण विद्यार्थी भारत में किसी भी परीक्षा में भाग नहीं ले सकेगा |

इस वक्त तुम्हारी मुस्कान और जीवन जीने की लालसा लुप्त हो गयी | समस्त दांव पर लग चूका था | ये वो वक्त था जब तुम्हारे लिए स्थिर रहना असंभव हो गया | तुम्हारे ज्यादतर साथी तो कोर्ट भी गए पर हमेशा की तरह मैनेजमेंट की ही जीत हुई |

तुमने एक सुविख्यात ऍम.एन.सी. में भी जॉब किया और उस कंपनी ने तुम्हें एक्वीजीशन लाने की जिम्मेदारी सौंपी थी जो वो आसानी से नहीं देती|यहाँ ज्वाइन करते ही तुमने अपने आप को फिर साबित किया |

इन सब उलझनों के बीच तुमने तय किया की तुम नए सिरे से बी-कौम करो और अपनी अलग पहचान बना सको इसलिए अन्य संस्था में फिरसे फर्स्ट इयर में डिस्टेंस लर्निंग कोर्स में एडमिशन लिए |

मेरे बच्चे, तुम्हारी उम्र ही क्या थी जो तुम्हे इतनी उल्झानो से जूझना पड़ा | हमने तुम्हे ये संस्कार नहीं दिए | इन सब फैक्टर्स ने तुमको अन्दर से इतना तोड़ डाला क्योंकि इस सिनेरियो में बदलाब लाना कोयले को घिसने जैसा था कितनी भी कोशिश करे, कालीख ही निकलेगी और अपने ही हाथ काले होते |

लोगो की प्रवृत्ति का जिसके कारण अगर उन्हें मदद के लिए उंगली दे तो वो हाथ पकड़ लेते है; तुमपर बढ़ता हुआ प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और तुम मन में कचोटते रह गये | क्या ये सब विधि के विधान में था?

मैंने कॉलेज से तुम्हारी सेमेस्टर फीस और कौशन मनी दोनों ही वापस नहीं लिए | तुम्हारी माँ चाहती है कि कॉलेज वालो से बात की जाये कि उनके डायरेक्टर के गलत बर्ताव के कारण ये सब हुआ | लेकिन मै ये नहीं चाहता क्योंकि मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है बल्कि वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ है ताकि भविष्य में किसी के पुत्र के साथ एसा धोखा न हो |

तुम्हे याद है ! तुमने फर्स्ट और सेकंड सेमेस्टर टॉप किये लेकिन स्थितिया तब बिगड़ने लगी जब सेकंड सेमेस्टर में तुम्हारे कॉलेज में नए डायरेक्टर आए | उन्होंने तुम्हारे लिए इतनी मुश्किलें खड़ी कर दिए की तुम कॉलेज जाने से कतराने लगे | तुम्हे मोरल सपोर्ट देने में मै रोज़ तुम्हे कॉलेज छोड़ने जाता था | यहाँ तक की मेरा भी एक बार उनसे किसी बात पर बहस हो गयी थी |

तुम और तुम्हारे साथी अपने नए एच.ओ.डी.से इतने ट्रस्ट थे की तुम सबने शिकायत-पुस्तिका में उनकी शिकायत भी किये किन्तु उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई | फिर भी ५ सितम्बर (शिक्षक दिवस) के दिन तुमने उनसे हर पर्सपेक्टिव पर बातचीत किये और पैर छुए | तुमने उनके समक्ष अपना व्यक्तित्व उजागर किया, तुम टोपर रहे हो लेकिन उनके नज़रिए में खुद को स्थापित करने के लिए तुम अपनी मुश्किलों को ओवेर्कोम करते हुए उनकी इच्छाएँ पूरी करते रहे | बाद में मुझसे बोले कि आज मैंने दुश्मन को माफ़ करना सीख लिया और तुम खुद में काफी हल्का महसूस कर रहे थे |

तुम इस संस्था से ऍम.बी.ए.तो कर रहे थे किन्तु हमेशा यहाँ की पढाई से असंतुष्ट रहते थे क्योंकि यहाँ की पढाई केवल रटन्बाजी की थी जो सर्वथा गलत है क्योंकि ये पढाई छात्रों को व्यवसाय के लिए तैयार करती है जो काएदे से प्रोजेक्ट बेस्ड होनी चाहिए (सागर की सतह से उसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता) | रटन्बाजी केवल सतह तक सीमित है,असली जीवन के पक्षों को प्रोजेक्ट द्वारा ही समझा जा सकता है |

लेकिन कहते है न कि आधे मटके पर पानी ठहरता नहीं | व्यक्ति का स्वाभाव उसका पीछा जीवनपर्यत नहीं छोड़ता और उनकी खुद की समस्याए इतनी रहती है की वो दूसरो को दिक्कतों में डालकर खुद बेफिक्र होते है | वो फिर से अपने पुराने रवैये पर आ गये |

तुम्हारे विषय के प्रमुख ने तुम्हे अपने विषय में पूरे अंक दिए थे, क्योंकि तुम्हारा वे ऑफ़ प्रेजेंटेशन और स्टाइल अनोखे थे | उक्त डायरेक्टर को इसमें भी आपत्ति थी और उन्होंने तुम्हे फिर नीचा दिखाने के लिए तुम्हारी मौखिक परीक्षा लेने के लिए तुन्हें बाध्य किया |

२२ तारीख से तुम्हारी लिखित परीक्षा शुरू हो रही थी और तुम्हारे डायरेक्टर १९ से २२ तारीख के बीच तुम्हारी मौखिक परीक्षा लेना चाहते थे | तुम वाकई विलाप कर रहे थे कि तुम कैसे प्रिपेयर कर पाओगे, तब भी परीक्षा देने तुम कॉलेज अकेले गए लेकिन वो फिर भी नहीं आए | कदाचित उस दिन के तुम्हारे साथी और वहा जाने के मार्ग के अन्य फैक्टर्स भी तुम्हारी मनः स्तिथि के प्रतिकूल थे |

मै जानता हूँ मेरे बच्चे तुम्हारे विषय में उनके हस्तक्षेप को तुम व्यक्त नही कर पाए और अन्दर ही अन्दर घुट गए | यहाँ तक कि उन्होंने पूरी क्लास के समक्ष तुम्हे बेवजह अपमानित किया | तुम्हारी माँ ने भी वो ई-मेल पढ़ा जिसमे उक्त डायरेक्टर ने तुम्हारे कॉलेज ना आने का कारण पूछा था |

मै वास्तव में उसे पढ़कर स्तंभित हुआ कि यद्यपि मैंने उन्हें बताया था कि तुम्हारी माँ कैंसर से पीड़ित है और तुम्हारी अत्यंत संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए वो तुम्हारे साथ सख्ती न बरते | इसके बावजूद वो क्यों तुम्हारे पीछे पड़े थे?

जब भी मै कार चलता हूँ, तो तुम्हे मैंने जिस मैदान पर कार चलाना सिखाया था, वो याद आता है | हालांकि तुम कहते थे कि अगर कार रखने का सामर्थ्य है, तो ड्राईवर रखने का भी सामर्थ्य होना चाहिए | खैर जो भी हो, तुमने कार चलाना सीख लिया |

ऐसा नहीं था की पूर्व में ईश्वर ने तुम्हारी सहायता नहीं की, जब तुम्हे सेमेस्टर फीस के लिए पैसो की ज़रुरत थी तब मेरे जमा-खाते में आवश्यकता अनुसार पैसे नहीं थे, पर तभी तीन दिन के लिए अकस्मात् डॉलर के प्रति रुपये की कीमत में इतनी गिरावट आई जितनी रकम तुम्हारी फीस भरने के लिए मेरे खाते में पर्याप्त थी | जब उसने तुम्हारी इस कदर मदद की, फिर, क्या वो तुम्हे जीने के लिए और समय नहीं दे सकता था?

उसकी इस भूल के लिए, तुम खुदको दोष मत देना | दिखावे के इस युग ने तुम्हे भी भटकाने की चेष्टा की किन्तु सहज प्रज्ञा के आधार पर मैंने तुम्हे उन मित्रो से सांकेतिक रूप से सावधान किया जो भविष्य में तुम्हारे लिए प्रारब्ध-वश संकट उत्पन्न कर सकते थे, और, हुआ भी वही | सह-पाठियो के दबाव ने तुम्हारी दुविधाए और बढ़ा दी |

तुम आधुनिक युग के हो, तो स्वाभाविक है तुम्हारी पसंद भी नवीन होगी | ग्रहों के दुष्प्रभाव का ख्याल करके मै तुम्हारे काले वस्त्रो के खिलाफ था | तुम्हे नयी घड़ियाँ बहुत पसंद थी किन्तु तुम्हारे दादाजी को तुम्हारा ये शौक उचित नहीं लगता था | सामंजस्य बिठाने के लिए तुम्हे सलाह दी जाती, कि तुम दादाजी से नज़र बचाकर पिछले द्वार से निकल जाया करो | इन स्तिथियों पर तुम कहते थे की मै परोक्ष में कोई कार्य नहीं करोगे |

मेरे प्राणों से अधिक प्रिय, पुत्र, तुम मेरे पूरक हो | मै तुम्हारे बचपन से तुम्हारा मित्र रहा हूँ, बाल कटवाने हम साथ में जाया करते थे, वहाँ भी तुम मुझसे सारी बाते साझा करते थे, मेरे बालो पर अपने हिसाब से उचित प्रयोग करते थे, ऐसा अपना बंधन रहा है | हम दोनों को परस्पर ई-मेल पासवर्ड्स भी ज्ञात थे, किन्तु फिर ऐसा क्या था मेरे अंश जो तुम मुझसे नहीं कह पाए ?

जब मै तुम्हारी बहनों और दोस्तों- आशु, अंशुल, नानू, मोना, और ख़ास तौर पर मफिन, के तुम्हे भेजे हुए सन्देश और तुम्हारे द्वारा उन्हें भेजे हुए सन्देश के बाद एक अजीब सी सिरहन दौड़ गयी, कहना तो किसी के बारे में बहुत कुछ चाहता था दुनिया से, परन्तु वो कभी तुम्हारे मित्र थे और उन्होंने तुम्हे ख़ुशी दी थी ( कुछ पल के लिए ही सही ) इसलिए उनके विरूद्ध कुछ लिखने की इच्छा नहीं हुई |

तुम्हारे जन्म के समय तो मै हर तरीके से संपन्न था, किन्तु, कुछ वर्षो के पश्चात मै कुछ समय के लिए आर्थिक अभाव के दौर से गुज़रा | वो मेरे जीवन में भी बदलाव का दौर था जब मै पूर्णतः ईश्वरीय आनंद प्राप्त कर उसकी इच्छा अनुसार अन्य को उस तक पहुचाने में सक्षम बना |

ब्रह्माण्ड की हर क्रिया में कारण निहित होता है; ईश्वरीय आनंद वो बीज था जिसका तुम्हारे रूप में मुझे अंकुर मिला | तुम्हारे वियोग की भावना ही तो वो जल है जिससे सींच कर उसमे कोपले आएँगी |

तब मै तुम्हे कार में नहीं अपितु बाइक में ले जाता था जिसके लिए मैंने शर्मिंदगी जताई, जिसपर तुम बोले, कि अच्छा है न पापा- बाइक में हम करीब बैठते है और ताज़ी ठंडी हवा का आनंद ले सकते है | इश्वर जिससे प्यार करता है उसको अभाव देता है अन्य को अर्थ | अब तक तो तुम मेरे प्राण थे किन्तु इस कथन से तुम मेरी आत्मा भी बन गये |

तुमने बता दिया था कि अपना प्यार तूफानों से भी दृढ़ है लेकिन हवा के झोंके से भी नाज़ुक है | तुम हमेशा कार में मेरी बगल वाली सीट पर बैठे रहे यहाँ तक की तुम्हारी माँ भी वहां नहीं बैठ सकती थी, जैसे स्थिर सरोवर में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब स्पष्ट दिखता है वैसे ही आज भी, मेरे पुत्र, तुम वही बैठते हो, आज भी…

ऑफिस के मेज पर आज भी तुम्हारी मैक-बुक रखी है | रोज़ जब भी ऑफिस जाता हूँ तो उससे बाते करता हूँ और वजह खोजता हूँ कि मेरी गलती क्या थी ? जब कभी दोपहर के समय तुम मेरे ऑफिस से सोफे पर सो जाया करते थे, तो तुम्हे आभास भी न हो, इस तरह आज भी मै तुम्हे निहारता हूँ |

Read Part 3              Read Part 5