Father’s Diary – Part 5

“अलविदा,.”

जैसे अर्जुन के पास सबकुछ था, वासुदेव थे, शब्दवेधी बाण विद्या थी किन्तु अभिमन्यु की मृत्यु को वो रोक नहीं पाए क्योंकि सारे शगुन उस दिन विपरीत थे,ऐसे ही जो भी शक्ति उस दिन तुम्हे वह प्रलयंकारी कदम उठाने से रोक सकती थी, सृष्टि ने अनुपस्थित कर दी |

चक्रव्यूह में प्रवेश करना केवल अभिमन्यु को मालूम था, संसार के चक्रव्यूह को तुम्हीं ने भेदा जो यहाँ से जाने के दिन का चयन तुमने किया | जिस दिन तुम संसार में आए, उसी दिन तुम यहाँ से गए, ये अद्वितीय है | एक दिन पूर्व तुम घर में सबसे बहुत प्यार दिखा रहे थे | शाम को तुम मंदिर से आए और रात को हमें संकेत कुछ ऐसे दिया :-

आओ आज वक़्त के पैरो पर मरहम लगा दे |
मेरे सपनो को तोड़ते हुए तो दर्द उसे भी हुआ होगा |

लेकिन हम समझ नहीं पाए | मुझसे ये गलती कैसे हो गयी जबकि बिना बताये ही मैंने अनगिनत लोगो के दुखों को कम किया है | तुम्हारी माँ जब मुझे ये याद दिलाती है तब मै ये सोचता हूँ कि जब बच्चा कुछ बोल भी नहीं पाता तब भी माँ तो उसकी मनोदशा से वाकिफ होती है, फिर अब क्यों नहीं?

उस दिन से तुम्हारी परीक्षा आरम्भ थी, पहला पेपर इनकम- टैक्स का था | (बाद में समझ आया कि परीक्षा तो मेरी हुई – कहते है कि ईश्वर परीक्षा लेने से पहले उत्तीर्ण करने की क्षमता दे देते है लेकिन तुम्हे खोने का गम मेरी रूह आज भी सहने में असमर्थ है | मैंने ईश्वर से कभी कुछ नहीं माँगा, अब यही प्रार्थना है कि वो किसी माता – पिता को ये दिन ना दिखाए) |

दो दिन पहले तुमने मुझे ऑफिस फोन करके कहा कि मुझे इनकम – टैक्स की किताब मंगवा दो | मैंने मजाकिया अंदाज़ में कहा की बड़े जल्दी याद आ गयी | तुमने पास बाज़ार से किताब तो मंगवा ली और पढाई भी शुरू कर दी | उस दिन तुम्हारी वही किताब और आठ पेपर्स मिले |

उस दिन मैंने ऑफिस जाने से पहले दो बार तुम्हे चूमा और तुम्हारे साथ हाथ मिलाया पर दोनों बार न तुमने उस दोस्ताना लहेजे में मेरा हाथ दबाया और न सदा के उत्साह के साथ गले मिले | चूंकि उस दिन तुम्हारी परीक्षा थी इसलिए मैंने तुम्हारी उदासीनता का कारण नहीं पुछा ताकि तुम मन में कोई विषाद ना रखो |

तुम्हारी अपनी सबसे छोटी बुआ से विशेष रूप से घनिष्टता थी | परीक्षा से पहले तुम उससे ज़रूर शुभकामनाये लेते थे भले ही तुम्हे परीक्षा के तुरंत पूर्व हॉल से बाहर निकल कर लेना पड़े | उस दिन चूंकि तुम्हारी परीक्षा दोपहर २ बजे से थी इसलिए तुमने उससे बात नहीं किये | अगर कर लेते तो शायद तुम्हारा मन बदल जाता पर विधि के विधान में कुछ और था |

मै भारी मन से ऑफिस पहुंचा लेकिन मुझे तुम्हे कॉलेज के बाद छोड़ना था, तो मैंने सोचा कि तुमसे तुम्हारी बेरुखी का कारण तब पूछ लूँगा पर मेरी जान मै नहीं जनता था कि वह तो मेरी बेरुखी थी जो तुममे परिलक्षित हो रही थी |

तुम्हारी हर परीक्षा के समय मै तुम्हारे कॉलेज प्रांगण के बाहर इंतज़ार करता था पर मै नहीं जानता था कि ये इंतज़ार मेरी परीक्षा का था | उन ३ घंटो में मै स्वाध्याय करता या लिखता, उस समय की अपनी मनः स्तिथि के अनुसार | लगभग ११ :३० बजे मुझे घर से फोन आया- मै अस्पताल भागा और आई.सी.यू. में ज़िन्दगी में पहली बार प्रवेश किया |

तुम्हारी माँ की प्राणघातक व्याधि की विकरालता से जूझना (लम्बे अंतराल तक असहनीय पीड़ा को धैर्यपूर्वक बर्दाश्त करना) और तुम्हारे दादाजी का अस्पताल में ऑपरेशन – मैंने अकेले ही दोनों को संभाल दिया और दोनों सकुशल घर आए | उस दिन जब तुम अपने पास मुझे खीच लाये तब अस्पताल में हमने ८ घंटे तक संघर्ष किया | शाम तक सब सामान्य हो रहा था और हम तुम्हे घर वापस लाने को उत्सुक थे |

परन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कुछ अवांछनीय शख्स के आगमन से सबकुछ बिगड़ गया था | उनमे से किसी व्यक्ति की वजह से मै अपनी जिंदगी के सबसे बुरे दौर से गुज़रा था और चूंकि मै उस वक़्त किसी के लिए भी अपने ज़हन में अप्रिय विचार नहीं लाना चाहता था, मै उस स्थान से बस ३ मिनट के लिए उठा | वो शख्स तो चले गए पर उस अंतराल में सबकुछ ख़त्म हो गया |

“ठीक बुझने से पहले लौ तेज़ हो जाती है|”

तुम्हारी माँ ने कंप्यूटर चलाना सीख लिया है और एप्पल के सेवा विभाग में वो खुद गयी थी तुम्हारे कंप्यूटर के दस्तावेज पुनः प्राप्त करवाने क्योंकि इतने दिन बंद रहने की वजह से सिस्टम क्रेश हो गया था | अब तुम्हारी माँ तुम्हारे सारे उपकरण-आई-फ़ोन,आई-पेड,आई-५-जिन्हें वो किसी और को हाथ लगाने नहीं देती;उनमें तुम्हारी तस्वीरें निहारती है और न जाने कब वो रोते-रोते सो जाती है |

पर आजकल रातों को वो सोती नहीं, मेरे साथ इंतज़ार करती है और कहती है कि अभी तुम अपने कमरे से आवाज़ दोगे-माँ इधर आओ-और फिर तुम मेरी शिकायत लगाओगे कि मैं तो तुम्हारा ध्यान नहीं रखता, क्यों मेरे पास बैठती हो और बहाने बना-बना कर तुम उसे उसे अपने पास बैठने को मजबूर कर दोगे|
अब डॉक्टर्स ने उसकी औषधी बढ़ा भी दी फिर भी वो सोती नहीं | उसकी औषधी के वक़्त का अलार्म तुम्हारे फ़ोन पर था,तुम्हारे फ़ोन का पासवर्ड प्रोटेक्टेड होने की वजह से रिसेट करवाना पड़ा |

तुम्हें पता है,तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे दादाजी के पहले जन्मदिन पर मैंने उन्हें गले नहीं लगाया न उन्हें फूल दे पाया | मैं अन्दर ही अन्दर घबरा रहा था क्योंकि तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने तुम्हें गले लगाया था और तुमने ना तो मेरा हाथ दबाया था जैसे तुम दबाते थे और ना ही वो उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया दी थी |

बगिया में माली कठोर जतन करके एक पौधे को स्थापित कर सींचता है | उस पौधे में उसका सबसे प्रिय फूल अपने पूर्ण वैभव में खिलकर अचानक मुरझा जाए,तो उस माली की क्या दशा होगी?कुछ ऐसी ही हालत तुम्हारे दादाजी की है |

पुत्र, माता-पिता की आँखों का तारा तो होता ही है परन्तु दादा और दादी के लिए कदाचित वो पुत्र से भी अधिक प्यारा होता है | तुम्हें याद है,एक बार तुम्हारे दादाजी व दादीजी ट्रेन से कहीं जा रहे थे और उन्हें छोड़ने तुम्हें जाना था क्योंकि मैं किसी कार्यवश नहीं आ सकता था|ट्रेन के अटेन्डेन्ट ने उनका विशेष ध्यान रखा |

बाद में तुमसे पूछने पर तुमने बताया कि तुमने उस अटेन्डेन्ट को इस काम के लिए टिप दिए थे | मेरे बच्चे, जब तुम्हें अपने दादाजी व दादीजी का इतना ख्याल था तो तुमने ये कैसे सोच लिया कि वो तुम्हारे बगैर ठीक रहेंगे?

माता-पिता को तो पुत्र से अपेक्षाएं होती है लेकिन दादा-दादी को तो वो भी नहीं | मैंने तुम्हारे दादाजी को ऐ.टी.ऍम. चलाना सिखाने को कोशिश किया लेकिन हर बार वो रोकर वापस आकर गाड़ी में बैठ जाते है |

तुम्हारी दादी नींद की गोली लेकर सो जाती है किन्तु फिर अर्धरात्रि में चीख उठती है कि तुम अपने पिता को अकेला छोड़कर कहाँ चले गए ?

मैंने कितने वंशो को वो हासिल करने में अकल्पनीय मदद की जिनके वो योग्य थे तथा जो उनका इक्छित है; नैतिक मूल्यों पर समझौता दिए बिना | न जाने कितने भटके हुए किशोरों, युवको को सही मार्ग पर लाया; कितनो को भटकने से बचाया है | जब तुम्हारा मार्गदर्शन करने का समय आया तो निष्ठुर विधि ने तुम्हे मेरी बाहों से छीन लिया |

कोयले की खदानों से उठाकर अनगिनत हीरों को मैंने तराशा है | इस घोर कलियुग में; जहाँ देह, दिल और दिमाग तीनो एक दूसरे के शत्रु बने हुए है ( रिश्तो की तो बात ही क्या) आँगन के दीपक की तरह; मैंने प्रत्येक पक्ष में सामंजस्य स्थापित करते हुए, कितने ही व्यक्तियों को उनकी योग्यताओं से रूबरू कराया |

किन्तु मेरे बच्चे मै तुम्हे नहीं तराश पाया; कदाचित तुम्हे इसकी आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि तुम तो स्वयं खेवनहार हो | मैंने लोगों को जीने की राह दिखाई लेकिन तुम अब मुझे राह दिखा रहे हो | केशव की ज़रुरत अर्जुन को थी, अभिमन्यु को नहीं |

सब ज्ञात होते हुए भी तुम्हारी माँ और मै तुम्हारा वियोग सह नहीं पाते है | हम समझ नहीं पाए कि तुम्हारी इतनी क्लिष्ट मनः स्तिथि का हम अनुमान क्यों नहीं लगा पाए | एसा नहीं कि तुमने इस विनाशक ख्याल को अपने ज़हन से हटाने की पूर्व में कोशिश नहीं किये (क्योंकि तुम मानव जन्म के महत्त्व से वाकिफ हो) |

किन्तु जब भी तुम्हे प्रतीत हुआ की तुम मौजूदा हालात के अनुसार चल पाओगे, कोई न कोई घटना ऐसी होती जो तुम्हे विषाद की ओर वापस ढकेल देती | पिछले कुछ दिनों में तुम बारम्बार उस अवस्था से अवगत हुए जिसने शायद तुम्हारी मनोवृत्ति इस आपदा की ओर केन्द्रित की-दोस्तों के प्रियजनों का निधन और उसके दुखद परिणाम |

जब मैंने अखबार में तुम्हारे कॉलेज का वैसा ही विज्ञापन देखा, अन्दर एक अजीब-सी सिरहन दौड़ गयी; ये सोचकर की न जाने अब कितने और नवयुवक तुम्हारी इस प्रलोभन में फसकर अपना विनाश आमंत्रित करेंगे | तब मैंने तुम्हे पत्र लिखकर उन्हें सतर्क करना चाहा |

तुम्हारी कार्यसिद्धि के एक माह पूर्व तुम मुझसे कहते थी की हमें किसी ऐसी जगह बसने चले जाना चाहिए जहाँ प्रकृति का कुम्भ हो, जहाँ पर्वत से नदी का उदगम हो | तुम्हारा उदगम तो मुझसे है, क्या तुम मुझे कोई संकेत दे रहे थे?

अब तुम पूर्णतः मेरे ही पास आ गए | जाने के दो दिन पूर्व मेरे पास लेटकर तुमने मुझसे अकारण क्षमा मांगे | मै तुम्हारे इस कृत्या के पीछे के कारण का अनुमान नहीं लगा पाया जबकि मुझे इस विद्या में महारत हासिल है |

एक ओर विधि के इस क्रूर विधान को हम स्वीकार नहीं कर पा रहे थे, उसपर लोगो ने निरर्थक अनुमान लगाकर हमारी पीड़ा बढ़ाने में कोई कसार नहीं छोड़ी |

एक पिता अपने कंधे पर अपने पुत्र का जनाज़ा जब ले जाता है, ब्रह्माण्ड की कोई वेदना उसकी तुलना नहीं कर सकती किन्तु इस स्तिथि के भी समाज के हस्तक्षेप ने हमें अपने-आप में नहीं रहने दिया |

पुत्र हमने खोया फिर भी परिवार के अन्य सदस्यो को हमसे ये शिकायत थी कि हमारे ही पालन पोषण में कमी थी | वो यही कहते रहे की अब वंश कैसे चलेगा ? लेकिन मुझे उनकी शिकायते नहीं सुलझानी अपितु तुमने तो मुझे हर ऋण से मुक्त कर दिया क्योंकि संतानोत्त्पत्ति का केवल एकमात्र उद्देश्य है – पितृऋण से मुक्ति |

तुमने मेरी खातिर इस संसार को बार – बार अपने कर्योद्देश्य से अवगत कराये हो कि तुमने अपने सभी पितरो को तार दिए क्योंकि तुम पितरो को मोक्ष दिलाने गए और उसके अगले वर्ष भी सोमवती अमावस्या पर पितृऋण अमावस्या पड़ी तो ये कार्य सिद्ध हो गया |

अपने नाम के अनुकूल तुमने इस व्यवस्था के विरोध में वो तारीख चुना जिसपर करीब ५०० वर्ष पूर्व इस भवसागर से पार करानेवाली महाशक्ति ने समाधी ली |

हम आज भी इसी आशा में जी रहे है कि किसी तरह कालचक्र विपरीत दिशा में घूम जाये किन्तु दैवी निर्णय के खिलाफ जाना विपत्ति के अन्य रूप में आमंत्रित करना होता है | हम सब तो इश्वरीय अभिप्राय की पूर्णता के निमित्त है तथा जब उसके संकल्प से हम समरसता स्थापित कर लेते है, तो बंधन की गहराई भी दैवी विधान के हकीकत में रूपांतरण होने में हस्तक्षेप नहीं करने देता |

ये मेरा सबसे कष्टप्रद इम्तिहान था – एक ओर परमात्मा की कठोर इच्छा थी तो दूसरी ओर तुम जिसने मेरे परोपकार और जनसामान्य के प्रति रहमत का सर्वाधिक आघात सहा |

ज़िन्दगी व्यर्थ लग रही है | पूर्व में मैंने न जाने कितनी प्रतिकूलताओ को अपनी ताकत में बदला है | सागर सदृश्य मैंने असंख्य संतापों को अपने में समेटा है और सदैव स्वयं शांत रहते हुए दूसरो को सुकून दिया पर अब मेरे लिए आगे बढ़ना दुष्कर हो गया है | अब तुम्हारी माँ को मेरी किसी और समय से कही अधिक आवश्यकता है |

अमावस्या के दिन चाँद के गुरुत्वाकर्षण से धरती के समुद्र में ज्वार का प्रादुर्भाव होता है | क्या उस चाँद ने मेरे चाँद के दिल में भी ज्वार ला दिया? लेकिन नहीं मेरे अंश, चाँद तो केवल सूर्य का प्रकाश रिफ्लेक्ट करता है और तुम तो मेरे सूर्य हो क्योंकि जग को मैंने रौशन किया है पर मुझे तुमने रौशन किया |

तम्हारी कार्यसिद्धि के प्रारंभ में लोगो के अभिकथन मेरे लिए तुच्छ थे, अब मै इस यथार्थ से एक बार फिर वाकिफ हुआ हूँ कि वो आज मेरे लिए और भी महत्वहीन हो गए है क्योंकि अब मुझे तुम्हारी मंजिल तक पहुँचाना है जिसके लिए तुमने इतना बड़ा त्याग दिया |

पुत्र, पिता का हाथ थामे तो वो छोड़ सकता है पर पिता, पुत्र को मृत्यु में भी नहीं छोड़ सकता | मेरे पुत्र, अब मै तुम्हे अकल्पनीय ढंग से वो दे रहा हूँ और दूंगा जिसपर सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा अधिकार है क्योंकि अब मेरे पास खोने के लिए कुछ और नहीं रहा |

जिनके लिए तुमने अपने सेमेस्टर की फीस ट्रान्सफर कर दी थी, और जो तुम्हे अपना पार्टनर बनाकर कंपनी बनाना चाहते थे, उन सब लोगो ने मुझसे संपर्क करना बंद कर दिया | दोस्त जैसे तुमसे मेरी बहस होती थी और तुम लोग कहते थे कि आप व्यापारिक निर्णय दिमाग से नहीं अपितु दिल से लेते है |

तुम सही हो – वो सब गायब हो ही गए – इसलिए अब मै खुद को सभी दायित्वों से मुक्त कर रहा हूँ और जो भी बिजनेस स्थापित किया था उसके लिए उचित पात्र को तैयार कर रहा हूँ | लेकिन ये आसन नहीं है क्योंकि उसके मनः पटल पर जो पहले से अंकित है उस लिखावट को मुझे पहले मिटाना है फिर नए सिरे से उसे सिखाना है |

मैंने हमेशा सबका भला चाहा और इसके लिए खुद कष्ट सहा है, और कहते है न की यदि हम अच्छा करेंगे तो हमारा अच्छा होगा फिर मेरे साथ एसा क्यों हुआ?

विधि के विधान में यही है – उसने मेरी कथा आंसू में डुबोके लिखी है, तभी तो वो मेरे सारे बन्धनों को तोड़ भी रही है ताकि अब बस, अब और नहीं…