Father’s Diary – Part 7

सुन रहा है ना तू, रो रहा हूँ मै;

सुन रहा है ना तू, क्यों रो रहा हूँ मै

बालकाल में जिस कम्बल पर तुम सोते थे, वो अब मेरा आसन है, पहले मै ध्यान से उठकर सबकुछ तुम्हारे हवाले कर देता था पर अब बस वाइब्रेशन भेज देता हूँ की तुम जहाँ भी हो, खुश रहो, सशक्त रहो | मुझे लगता है की जब मै तुम्हारे लिए ये मांगता था कि तुम जो चाहते हो, तुमने उसमे कामयाबी मिल गयी ; कही मैंने ही तो गलत नहीं मांग लिय?

लेकिन नहीं मेरे प्रिय, मैं जो-जो तुम्हारे हवाले करता गया, अब तुम वो सारा दायित्व मुझे दे गए हो | तुम्हे बनाकर लक्ष्य अब मुझे वो राह अपनानी है जिस पर चलकर मै तुम्हे नए रूप में फिर से पा सकूँ क्योंकि मेरे पास होते हुए भी जब तुम सामने नहीं होते, तो मंजिले हज़ार हो तो भी उन्हें पाने की तमन्ना नहीं होती |

तुम्हारी मृत्यु प्रमाण-पत्र के लिए अप्लाई करने के एक महीने बाद वह मिली | इस तरह तुम्हारे जाने पर मुझे पुलिस स्टेशन भी जाना पड़ा जहाँ जाना मैंने हमेशा टाला था, लेकिन कहते है न की जिसको जितना टालो वो और भी विकराल रूप लेकर सामने आती है; हमें वहां तीन बार जाना पड़ा |

विपत्तियाँ आती हैं तो सब ओर से आती हैं | तुम्हारे जाने का संताप शायद कम था जो इस यातना से गुज़रना पड़ा | तुम्हारी माँ से खात्मा रिपोर्ट के बारे में पूछताछ की गयी, उस समय वो पूर्णतः अश्रुपूरित थी | ईश्वर की सहमति के बगैर कुछ नहीं होता |

पुलिस वालो ने कहा कि आपने गलत अस्पताल चुना, आप गलत इलाके में रहते थे – वहां कुछ ऐसी वारदातें हुई, जिनकी वजह से वहां के वाइब्रेशनस गलत थे (क्या आस पास के वातावरण का शख्स पर इतना प्रभाव पड़ता है?) तुम्हारी पी.ऍम. रिपोर्ट पढना तो मेरे लिए वो भयावह अनुभव था जिसने मुझे ये करुण प्रार्थना करने पर मजबूर कर दिया कि चाहे जो हो जाये, अपने माता–पिता के जीवन में ये दिन कभी मत लाना |

तुम्हे पता है, मैंने कभी तुम्हारा इन्शोरेन्स रेमिट नहीं कराया क्योंकि अब तुम तो पहले से कही अधिक मेरे जीवन में शामिल हो | तुम्हारा टाटा स्काई का सब्स्क्रिप्शन भी मैंने बदला नहीं क्योंकि वो भी मुझसे वही प्रमाण पत्र मांग रहे थे जिसका मेरे लिए कोई अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि तुम तो आज भी मेरे साथ टी.व्ही. देखते हो तो सब्स्क्रिप्शन को तो रिचार्ज कराने की ज़रुरत है, बदलने की नहीं |

मुझे याद है,जब तुम १०वी कक्षा में थे तब मुझे संसार से अत्यंत विरक्ति हो गयी थी और मैं घर छोड़कर अज्ञात स्थान पर चला गया | लेकिन मैं कुछ दिनों मैं लौट आया ; ये सोचकर की अभी तो मैंने तुम्हें कार ड्राइव करना भी नहीं सिखाया तो मैं कैसे छोड़ सकता हूँ | लेकिन जिस दिन तुमने ड्राइव करना शुरू किया, उस दिन तुमने मेरे स्थान पर स्वयं संसार त्याग दिया | एक दिन जब तुमने मुझे कार से ऑफिस छोड़ा, तब तुमने मुझे कहा कि अब मत कहना कि ड्राइविंग नहीं आती |

तुम्हारे जाने के बाद मेरे पहले जन्मदिन मेरी कर्मभूमि में हवन था | धुन्धुआते हवनकुंड सा मन भीतर ही भीतर सुलग रहा था जिसे प्रकृति बारिश करके शांत करना चाह रही थी पर तुम्हारे वियोग में वह गर्म तेल की भान्ति मेरी रूह को मानो चिढा रही थी |

यहाँ लोगों का सैलाब था किन्तु मैं जहां देखता था वहां तुम दिखते थे | इच्छा है कि धरती फट जाए और मैं उसमे समां जाऊं लेकिन अब तुम्हें मेरी पहले से कहीं ज्यादा आवश्यकता है इसलिए मुझे अपनी सीमाओं को बढाकर तुम्हारे संघर्ष को उचित अंजाम तक पहुँचाना है|

तुम तो ईश्वर की अमानत हो जिसकी देखभाल के लिए उन्होंने मुझे नियुक्त किया | नियति के अनुसार तुम आए और अपना कार्य पूर्ण करके चले गए | तुमने अपने जीवन में मुझे पर्वत की ऊँचाई दिखाई पर मेरे इस गम की गहराई को मापने के लिए समंदर भी पर्याप्त नहीं है |

ईश्वर ने मुझे लोगों का दुःख, उनकी दुविधाएँ कम करने के लिए भेजा है और साधक के मार्ग में जो भी बाधा होती है वो हटा दी जाती है चाहे वो साधक को तोड़ दे | लेकिन मेरे पुत्र, तुमने मेरे बिखरे टुकड़ों को उतनी ही शीघ्रता से जोड़ भी दिया क्योंकि पहले तो हमारे बीच में रिश्ते की दीवार थी पर अब तो तुम पूर्णरूप से रौशन हो तथा मुझे हर पल अपना एहसास कराते हो |

जीवन हमें यही तो सिखाता है – दर्द की खाई कितनी भी गहरी क्यों न हो,उसमे गिरकर उठाना संभव है | इस घोर आघात के बाद हम कैसे उठते हैं, हमारी प्रतिक्रिया ही हमारा आगामी समय निर्धारित करेगी क्योंकि पीड़ा तो अनिवार्य है किन्तु उससे प्रभावित होना हम पर निर्भर करता है |

वर्त्तमान, भविष्य का निर्माता होता है – तुम्हारे वियोग की आग में जलकर मेरे पुत्र,मेरा मन अब उन कार्यों के प्रति सक्रीय हो गया है, जिनकी पूर्ति के लिए तुमने इतनी प्रताड़ना सहे क्योंकि प्यार किसी दर्द का मोहताज नहीं होता|

आग में जल कर जंगल की भूमि एक विशेष उर्जा से परिपूर्ण हो जाती है जैसे अब हमारा प्यार जो अब असंभव को भी संभव करने को आतुर है | तुम वास्तव में हो, वास्तविकता कभी ख़त्म नहीं होती |

जो नहीं है वो कभी जिया ही नहीं ; जब हमें ये ज्ञात हो जाता है कि केवल शरीर नष्ट होता है, हम नहीं; तो हम शरीर का नाश एक निरस्त किये गए आवरण के रूप में देखते हैं | यथार्थ में हमारा न आदि है न अंत है | शरीर तबतक रहेगा जब तक इसकी आवश्यकता है |आवश्यक नहीं कि ये लम्बे अंतराल तक रहे |

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