Father’s Diary – Part 8

सुरंग के अंत में रौशनी
ये संसार कितना सुन्दर है, किन्तु हमने जीवन में क्लिष्टता भर दी हैं कि केवल परस्पर विरोधी संभावनाएं ही आरम्भ में दृष्टि में आती है हम उठने की चेष्टा ही नहीं कर पाते और पूर्व में ही लडखडा जाते है |
हम अपने आस-पास अनेक युवाओ को देखते है जिनके जीवन में सबकुछ अनुकूल है जिसकी कई लोग सपने देखते है फिर भी वो अपने जीवन से अत्यधिक असंतुष्ट रहते है क्योंकि हम बिना परखे उनपर प्राचीन मान्यताएं थोपते हैं|
तुम्हारे पास भी तो सबकुछ था लेकिन तुम भी तो इन्हीं कुरीतियों और कुशासन के भंवर में फँस गए|यदि वह शख्स तुम्हारे विपरीत भाग्यशाली हो तो इस खोखलेपन को कोई मानवरूपी ईश्वर का वरदहस्त प्राप्त होता है जो अपने संरक्षित उस कालीख में लिपटे हीरे के जीवन के अज्ञात पक्षों को सही दिशा देता है …………………………………………………………………………………………………………………. और उसे कोयले की खदान में से निकालकर कुछ ऐसे तराशता है जैसे ग्रहण लगा सूर्य फिर प्रकाशमान हो क्योंकि मेरे बच्चे तभी तो ये क्रम आगे बढेगा और कहीं न कहीं ये रौशनी तुम तक भी पहुंचेगी और तुम्हें इस भंवर से निकालेगी |
ईश्वर की स्रष्टि में प्रत्येक के लिए एक कार्ययोजना होती है|हम बड़े तो वो कुम्हार है जो उचित आकार देकर तुम्हारे सदृश्य हर एक को उसके उद्देश्य तक पहुँचने में सक्षम करें|
लेकिन हमने (व्यवस्था,शासन) तुम सबके ज़हन में इतनी दहशत भर दिए हैं जिससे तुम्हारे पाँव इतने रक्तरंजित हो गए हैं कि मंजिल तक पहुंचना तो दूर,चलना भी मुश्किल हो गया है|
मेरे प्रिय,तुमने तो हमें सिखा कि जीवन देने का नाम है|अब ये हम बड़ों का उत्तरदायित्व है कि हमने तुम सबके जीवन में जो अस्तव्यस्तता लाये हैं,उसे सुधारें|ये क्रिया बहुत कठिन और निराशाजनक होगी लेकिन फिर भी हमें ही बिगड़ी बनानी होगी|
ठीक सूर्योदय के पूर्व अँधेरा सर्वाधिक होता है|

भारत तो आरम्भ से ही विश्वगुरु रहा है|हमें अपनी संस्कृति ,अपनी आध्यात्मिक विरासत को सहेजना है तथा अपनी धरोहर को आगे बढ़ाना है|पाश्चात्य देश हमारी संस्कृति का लाभ ले रहे हैं और उनके रीती-रिवाजों को अपना रहे हैं जो हानिकारक सिद्ध हुई हैं|
हम केवल कहने मात्र के लिए स्वतंत्र हैं|वास्तव में हम आज भी अंग्रेजों के गुलाम हैं|हमने आज की अंधी दौड़ में तुम सबका जीवन जटिल बना दिया है|हमें जल्द ही असंतुष्टि के इस सुप्त ज्वालामुखी को क्रियान्वित होने से पहले रोकना होगा वर्ना तुम्हारे पदचिन्हों पर अन्य भी चलेंगे |
ये सही है कि जीवन एक संघर्ष है और हर परिस्थिति-चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल ,हमें सिखाने के लिए निर्मित होती है और कुछ समय बाद हमें इसकी वास्तविकता का भान होता है|
मैं तुम्हारी माँ से कहता हूँ कि तुम केवल उसके ज़रिये इस दुनिया में आए और कार्य पूर्ण कर दिए |हमे इस बात पर गर्व होना चाहिए किन्तु तुम्हारी कार्यसिद्धि के वर्ष उपरांत भी तुम्हारी माँ और मेरी दशा ऐसी है जैसे गंगोत्री की मछली को तप्त रेगिस्तानी रेत में डाल दिया गया हो|
सांस चलती है पर जीने की तमन्ना ही नहीं है|तुम तो अब भी पूर्व से अधिक व्याप्त हो लेकिन तुम्हारा वह सुगठित शरीर आँख-भर देखकर हृदय से लगाने को मन तरस गया है|पर इस एक साल में तुमने हमें डूबकर उभारना सिखा दिए|
मेरे प्रिय,तुम्हारी कार्यसिद्धि के बाद पहली अनंतचौदस पर तुम्हारा वियोग मेरे लिए अनंत गुना बढ़ गया जिसका प्रतिघात मेरे स्वास्थ्य पर पड़ा|मैंने अपना निर्धारित कर्म तो अच्छे से निभाया पर मैं हूँ तो इंसान|
जहां एक ओर लोग गणेशजी को विदा कर रहे थे,वहीँ मेरी आँखों के सामने वो क्षण बार-बार आकर मुझे बेचैन कर रहा था ,जब तुम्हारे स्वागत में मैं पलकें बिछाए हुए था|ये ऐसी चौदस थी जिसमे पूर्णिमा का समावेश था,हमें इस बात का भान कराता कि ये तुम्हारी पूर्णता का सफ़र है|